सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं:यहां ब्रह्मचारी देवता, महिलाएं क्यों आना चाहती हैं; SC ने कहा- करोड़ों की आस्था को गलत ठहराना मुश्किल

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केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में चौथे दिन सुनवाई हुई। मंदिर का मैनेजमेंट देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने कहा कि यह खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट का मामला नहीं है। यह आजन्म ब्रह्मचारी माने जाने वाले देवता का मंदिर है।

TDB का पक्ष रखते हुए एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा- 10 से 50 साल के उम्र की महिलाएं देवता के स्वरूप और पहचान के विपरीत हैं। भारत में अयप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं। अगर महिलाओं को दर्शन करना है, तो वहां जाएं। उन्हें इसी खास मंदिर में क्यों आना है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।

केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर बैन लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए बैन हटा दिया। इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं। सुप्रीम कोर्ट में इनके आधार पर 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर बहस हो रही है।

केरल के सबरीमाला मंदिर को अब आधिकारिक तौर पर श्री अय्यप्पा स्वामी मंदिर के नाम से

आज की सुनवाई के 5 अहम पॉइंट्स-

  1. PIL (जनहित याचिका) पर सवाल : एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि धार्मिक मामलों में जनहित याचिका से बचना चाहिए। इससे बाहरी लोग परंपराओं में दखल देने लगते हैं। कोर्ट ने भी पूछा कि क्या कोई भी व्यक्ति आस्था से जुड़े नियमों को चुनौती दे सकता है।
  2. धर्म बनाम सामाजिक सुधार पर बहस : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। जजों ने साफ किया कि सुधार और धार्मिक मान्यता के बीच संतुलन जरूरी है।
  3. आर्टिकल 25 बनाम आर्टिकल 26 का विवाद : सिंघवी ने दलील दी कि धार्मिक संस्थाओं को अपने नियम तय करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में संस्थाओं का अधिकार व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर हो सकता है।
  4. धार्मिक प्रथा की सीमा तय करने पर टकराव : सिंघवी ने कहा कि कौन-सी प्रथा धार्मिक है, यह तय करने का अधिकार समुदाय का होना चाहिए, न कि कोर्ट का। इस पर जजों ने भी अपनी भूमिका की सीमा पर चर्चा की।
  5. महिलाओं की एंट्री : इसके विरोध वाले पक्ष ने कहा कि महिलाओं की एंट्री पर रोक परंपरा और भगवान अय्यप्पा की मान्यता से जुड़ी है। वहीं समर्थन करने वाले पक्ष ने इसे महिलाओं के बराबरी के अधिकार का मामला बताया। कोर्ट में कल इस पर चर्चा जारी रहेगी।

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई

सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान भी महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखी गईं। केंद्र सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई अब 16 अप्रैल को होगी।

सिंघवी बोले- अयप्पा के 1000 मंदिरों में सिर्फ एक मंदिर में महिलाओं पर रोक

सिंघवी: मुझे बताया गया है कि भगवान अयप्पा के भारत में लगभग 1000 मंदिर हैं। लेकिन एक ही मंदिर में उनके आजन्म ब्रह्मचारी रूप की पूजा होती है। 10 साल से कम और 50 साल से ज्यादा उम्र की महिलाएं वहां जा सकती हैं।

सिंघवी: महिलाओं की एंट्री बंद करने का कारण सिर्फ लिंग (जेंडर) के आधार पर नहीं है। यह माना जाता है कि 10 से 50 साल के बीच की महिलाएं देवता के ब्रह्मचर्य स्वरूप के विपरीत हैं। लेकिन वे महिलाएं अगर चाहें, तो अयप्पा के बाकी 999 मंदिरों में जा सकती हैं।

सिंघवी: यह कोई दुकान या रेस्टोरेंट नहीं है। यह एक ऐसे देवता का मंदिर है जो आजन्म ब्रह्मचारी माने जाते हैं। इसलिए माना जाता है कि इस उम्र की महिलाएं उस स्वरूप के विपरीत हैं। महिलाएं इसी खास मंदिर में क्यों जाना चाहती हैं, जो अपनी अलग पहचान रखता है।

CJI बोले- करोड़ों लोगों की आस्था गलत, यह तय करना सबसे मुश्किल

सिंघवी: जनहित याचिका (PIL) धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या या उन्हें गलत ठहराने का माध्यम नहीं बननी चाहिए।

CJI: PIL की सुनवाई के लिए कुछ सामान्य सिद्धांत पहले से तय हैं।

सिंघवी: लेकिन अनुच्छेद 25 और 26 के मामलों में मानक (सीमा) कहीं ज्यादा सख्त होना चाहिए। धर्म करोड़ों लोगों की आस्था है। कोई तीसरा व्यक्ति सीधे अनुच्छेद 32 के तहत आकर इसे बदल नहीं सकता।

जस्टिस सुंदरेश: क्या अदालत करोड़ों लोगों को सुने बिना फैसला कर सकती है?

जस्टिस नागरत्ना: ऐसी PIL को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि याचिकाकर्ता खुद उस धर्म का मानने वाला नहीं है।

CJI: सबसे मुश्किल काम है यह तय करना कि करोड़ों लोगों की आस्था गलत है।

सिंघवी: और यही PIL में हो रहा है।

जस्टिस नागरत्ना बोली- प्रथा मानने वाला कभी उसके खिलाफ सवाल नहीं उठाएगा

सिंघवी: क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी धर्म या संप्रदाय से जुड़ा नहीं है और उसकी प्रथा को जनहित याचिका (PIL) के जरिए चुनौती दे सकता है?

सिंघवी: मैंने 23 फैसलों का चार्ट दिया है। इन सभी में अनुच्छेद 25 और 26 के मामले, उसी धर्म के मानने वालों ने उठाए हैं। यानी- जिसका अधिकार प्रभावित हुआ, वही चुनौती देने आया।

इस केस में स्थिति उलटी हो गई है। एक व्यक्ति (जो उस धर्म का नहीं है) चुनौती दे रहा है।

सही तरीका क्या होता है- मैं (व्यक्ति) या कोई संप्रदाय, अपने अधिकार के उल्लंघन पर कोर्ट जाते हैं। फिर कोर्ट फैसला करता है। लेकिन यहां ऐसा नहीं है।

यहां कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसका अनुच्छेद 25 या 26 का अधिकार प्रभावित हुआ हो। कोई कानून भी नहीं है।

एक PIL याचिकाकर्ता आकर कह रहा है- “मुझे लगता है यह धार्मिक प्रथा गलत है।”

अब स्थिति यह हो गई- जिसके अधिकार हैं (धर्म मानने वाले) वो चुनौती नहीं दे रहा, सरकार भी प्रतिवादी नहीं है, बल्कि हम और सरकार- दोनों ही PIL के खिलाफ खड़े हैं। यह पूरे सिस्टम को उल्टा कर देता है।

जस्टिस सुंदरेश: यह बात जस्टिस नागरत्ना भी कह चुकी हैं।

जस्टिस नागरत्ना: लेकिन मानने वाला (believer) तो कभी अपनी ही प्रथा पर सवाल नहीं उठाएगा। फिर याचिकाकर्ता कौन होगा?

सिंघवी बोले- कानून को कमजोर करने में संवैधानिक नैतिकता का इस्तेमाल गलत

जस्टिस अमानुल्लाह: क्या “संवैधानिक नैतिकता” को अलग-अलग परिस्थितियों में अलग तरह से नहीं समझा जा सकता? हम इसके कुछ तय मानक बना सकते हैं, फिर सीधे क्यों कहें कि यह लागू नहीं होती?

सिंघवी: अगर कोई कानून नहीं है, तो मायलॉर्ड्स परंपरा या संविधान की भावना (स्पिरिट) का सहारा ले सकते हैं।

जस्टिस अमानुल्लाह: यह एक बदलने वाला (फ्लूइड) सिद्धांत है।

सिंघवी: जहां-जहां इसे कानून को कमजोर करने के बड़े आधार के रूप में इस्तेमाल किया गया है, मैं कहूंगा कि वह गलत है। यह इस्तेमाल, गलत इस्तेमाल है, क्योंकि इसका डॉ. अंबेडकर की सोच से सीधा संबंध नहीं है। लेकिन अगर मामला कानून को रद्द करने का नहीं है, और किसी खाली जगह (गैप) को भरना है, तो यह हर मामले के हिसाब से अलग-अलग तय हो सकता है।

SC में ‘संवैधानिक नैतिकता’ पर बहस, CJI बोले- मानक तय करना मुश्किल

जस्टिस बागची: अनुच्छेद 25 और 26 पर “संवैधानिक नैतिकता” लागू करने का मतलब होगा गैर-सरकारी लोगों (नॉन-स्टेट एक्टर्स) को कंट्रोल करना। तो क्या इसे धार्मिक मामलों और उनके प्रबंधन में लागू करना चाहिए?

सिंघवी: अगर हम वह “वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिपरक” जांच लागू करें, तो “संवैधानिक नैतिकता” जैसा सिद्धांत बाहर से एक मानक थोप देता है। चाहे वह निजी हो या गैर-निजी—यह खतरनाक हो सकता है।

CJI: इस संदर्भ में “संवैधानिक नैतिकता” का खतरा यह है कि इसके मानक तय करना मुश्किल होगा। यह पूरी तरह व्यक्तिपरक हो जाएगा।

सिंघवी: यह ऐसा घोड़ा है, जिस पर सवार नहीं हुआ जा सकता।

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