अमेरिका 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलेगा:इसमें UN की 31 एजेंसी शामिल; भारत की पहल से बना सोलर अलायंस भी छोड़ेगा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को आधिकारिक रूप से बाहर निकालने की घोषणा की है। द गार्डियन के मुताबिक इसमें 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र (Non-UN) संगठन और 31 संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं शामिल हैं।
व्हाइट हाउस और स्टेट डिपार्टमेंट के अनुसार ये संगठन अमेरिकी हितों के खिलाफ हैं। इनमें पैसों की बर्बादी होती है। इसके अलावा ये गैरजरूरी या खराब तरीके से चलाए जा रहे हैं। इस कदम को ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा बताया जा रहा है, जो वैश्विक संस्थाओं से दूरी बनाने पर जोर देती है।
अमेरिका भारत की पहल से बने संगठन इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) को भी छोड़ रहा है। इसे 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रेंच राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने पेरिस जलवायु सम्मेलन में शुरू किया था।
रत-फ्रांस की अध्यक्षता से बना था सोलर अलायंस
इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) को सोलर एनर्जी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। यह दुनिया भर के देशों को सौर ऊर्जा इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करता है। इसका मकसद 2030 तक सोलर एनर्जी में 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश जुटाना है।
भारत इसका अध्यक्ष देश और फ्रांस सह-अध्यक्ष है। इसका हैडक्वार्टर हरियाणा के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी कैंपस स्थित है। फिलहाल इसके 120 से अधिक देश सदस्य हैं।
अमेरिका ISA में नवंबर 2021 में जुड़ा था। अमेरिका ने ISA के फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए और यह 101वां सदस्य देश बना। अब अमेरिका ने ISA छोड़ने का ऐलान किया है।

UN कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज से अलग होगा अमेरिका
इस फैसले की सबसे बड़ी बात है, अमेरिका का संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) से बाहर होना। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक UNFCCC 1992 का समझौता है, जो दुनिया के लगभग सभी देशों को जोड़ता है और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करता है।
यह पेरिस जलवायु समझौते के लिए भी अहम है, जिससे ट्रम्प पहले ही अमेरिका को बाहर करने की बात कह चुके हैं। ट्रम्प ने नवंबर 2025 में ब्राजील में संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा था।
इसके अलावा, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) जैसी महत्वपूर्ण जलवायु संस्थाओं से भी अमेरिका अलग हो रहा है। सेंटर फॉर बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी की जीन सू ने कहा कि इस गैरकानूनी कदम से अमेरिका हमेशा के लिए जलवायु कूटनीति से बाहर हो सकता है।
22 जनवरी से WHO का मेंबर नहीं रहेगा अमेरिका
इससे पहले ट्रम्प ने जनवरी 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर निकलने की घोषणा की थी।
WHO की सदस्यता से बाहर निकलने के लिए एक साल का नोटिस पीरियड जरूरी होता है। 22 जनवरी के बाद अमेरिका WHO का सदस्य नहीं रहेगा।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अमेरिका दूसरे नंबर पर
एक्सपर्ट का कहना है कि इससे वैश्विक जलवायु प्रयासों को गहरा झटका लगेगा। अमेरिका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देश है।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक रॉब जैक्सन जैसे विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे दूसरे देशों को अपनी जलवायु प्रतिबद्धता टालने और मनमानी करने का बहाना मिल सकता है। ट्रम्प लंबे समय से जलवायु परिवर्तन को ‘धोखा’ बताते आए हैं।

पूर्व जलवायु सलाहकार बोलीं- ट्रम्प दशकों की मेहनत बर्बाद कर रहे
ट्रम्प के इस फैसले की कड़ी आलोचना हो रही है। जो बाइडेन प्रशासन की पूर्व जलवायु सलाहकार जीना मैकार्थी ने इसे कमजोर सोच वाला, शर्मनाक और मूर्खता भरा निर्णय बताया।
मैकार्थी ने कहा कि अब दुनिया का एकमात्र देश जो UNFCCC का हिस्सा नहीं होगा, वह अमेरिका होगा, जिससे दशकों की अमेरिकी जलवायु नेतृत्व और वैश्विक सहयोग बर्बाद हो जाएगा।
इससे अमेरिका ट्रिलियंस डॉलर की निवेश, नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता खो देगा, जो अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाते और महंगी आपदाओं से बचाते।
नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल के अध्यक्ष मनीष बापना ने इसे ‘बेवजह की गलती’ और ‘खुद को नुकसान पहुंचाने वाला’ बताया। उन्होंने कहा कि इससे अमेरिका की चीन से प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता कम हो जाएगी। चीन स्वच्छ ऊर्जा तकनीक में अमेरिका से आगे निकल रहा है।
उन्होंने कहा कि बाकी दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, तो ट्रम्प प्रशासन वैश्विक नेतृत्व छोड़ रहा है और स्वच्छ ऊर्जा से आने वाले ट्रिलियंस डॉलर के निवेश से अमेरिका को वंचित कर रहा है।
ट्रम्प का आरोप- जनसंख्या एजेंसी जबरन गर्भपात को बढ़ावा देती है
एक और महत्वपूर्ण निकासी है संयुक्त राष्ट्र की जनसंख्या एजेंसी (UNFPA) से, जो दुनियाभर में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं देती है। रिपब्लिकन पार्टी और ट्रम्प पहले भी इस एजेंसी पर चीन जैसे देशों में ‘जबरन गर्भपात’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहे हैं।
हालांकि, बाइडेन प्रशासन के समय की जांच में ऐसे कोई सबूत नहीं मिले थे। ट्रम्प के पहले कार्यकाल में इसकी फंडिंग रोकी गई थी।
विदेश मंत्री बोले- हमारे खिलाफ काम करने वालों को आर्थिक सहायता नहीं देंगे
ट्रम्प के फैसले के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बयान जारी कर रहा कि ये समझौते अमेरिका की प्रगति से जुड़े हैं। यह अर्थव्यवस्थाओं और लोगों की जिंदगियों पर असर डाल रहे हैं।
रूबियो ने कहा कि इन संगठनों से अलग होने का कदम राष्ट्रपति ट्रम्प का अमेरिकियों से किए गए वादे को पूरा करता है। हम उन नौकरशाहों को आर्थिक सहायता देना बंद कर देंगे जो हमारे हितों के खिलाफ काम करते हैं। ट्रम्प प्रशासन हमेशा अमेरिका और अमेरिकियों को ऊपर रखेगा।

चीन से प्रतिस्पर्धा वाले संस्थाओं में दबदबा बनाना चाहता है अमेरिका
ट्रम्प प्रशासन पहले भी यूएन ह्यूमन राइट्स काउंसिल, यूनेस्को और फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए UNRWA जैसी एजेंसियों से बाहर हो चुका है। अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट का कहना है कि आगे भी दूसरे संगठनों की समीक्षा जारी रहेगी।
हालांकि, अमेरिका कुछ संस्थाओं में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है जहां चीन से प्रतिस्पर्धा है, जैसे इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन और इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रम्प प्रशासन की विदेश नीति काफी आक्रामक दिख रही है। हाल ही में अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला पर हमला कर विवादास्पद नेता निकोलस मादुरो को पकड़ लिया है और उन्हें अमेरिका लाया गया है, जहां उन पर मुकदमा चल रहा है।
साथ ही, ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की पुरानी इच्छा फिर जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये कदम अमेरिका को वैश्विक मंच पर अलग-थलग कर सकते हैं, लेकिन ट्रम्प समर्थक इसे अमेरिकी संप्रभुता और करदाताओं के पैसे की बचत बताते हैं।
जानिए अमेरिका के बाहर निकलने से संगठनों पर क्या असर पड़ेगा
- फंडिंग में कमी: अमेरिका इन संगठनों में सबसे ज्यादा पैसा देता है। उसके निकलते ही संगठनों के पास कम पैसे बचेंगे। कई योजनाएं रुकेंगी या धीमी पड़ेंगी।
- काम करने की ताकत घटेगी: अमेरिका साथ नहीं होगा तो इन संगठनों की दुनिया तक पहुंच और फैसले लेने की क्षमता कमजोर होगी, खासकर जलवायु जैसे मुद्दों पर।
- वैश्विक सहयोग कम होगा: अमेरिका के बिना इन संगठनों पर भरोसा कम होगा। अमेरिका के बिना वे अलग-थलग पड़ सकते हैं और अन्य देशों के बीच विश्वास कम हो सकता है।
- राजनीतिक चुनौतियां: इन संगठनों को वैकल्पिक फंडिंग और सदस्यों की तलाश करनी पड़ेगी, जिससे उनकी प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है।
- ढांचा बदलना पड़ेगा:: संगठन अमेरिका की अनुपस्थिति में अपनी संरचना और रणनीतियों को बदलने पर मजबूर होंगे, जो उनके मिशन को कमजोर कर सकता है।
- अन्य देशों पर प्रभाव: कई विकासशील देश अमेरिकी फंडिंग पर निर्भर हैं। इन संगठनों में कटौती से मानवीय सहायता, स्वास्थ्य और पर्यावरण परियोजनाएं प्रभावित होंगी, जिससे वैश्विक असमानता बढ़ सकती है।
पूरी लिस्ट देखिए…
| UN एजेंसी | नॉन UN एजेंसी |
| फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) | 24/7 कार्बन-फ्री एनर्जी कॉम्पैक्ट |
| इकोनॉमिक एंड सोशल काउंसिल (ECOSOC) | कोलंबो प्लान काउंसिल |
| इकोनॉमिक कमीशन फॉर लेटिन अमेरिका एंड कैरेबियन | कमीशन फॉर एनवायरनमेंटल कोऑपरेशन |
| इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड पैसिफिक | एजुकेशन कैनॉट वेट |
| इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर वेस्टर्न एशिया | यूरोपियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर काउंटरिंग हाइब्रिड थ्रेट्स |
| इंटरनेशनल लॉ कमीशन | फोरम ऑफ यूरोपियन नेशनल हाईवे रिसर्च लेबोरेटरीज |
| इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर | फ्रीडम ऑनलाइन कोएलिशन |
| इंटरनेशनल रिजिड्यूल मेकेनिज्म फॉर क्रिमिनल ट्रिब्यूनल | ग्लोबल कम्युनिटी एंगेजमेंट एंड रेजिलिएंस फंड |
| ऑफिस ऑफ द स्पेशल एडवाइजर ऑन अफ्रीका | ग्लोबल काउंटरटेररिज्म फोरम |
| संघर्ष में बच्चों पर महासचिव के विशेष प्रतिनिधि का कार्यालय | ग्लोबल फोरम ऑन साइबर एक्सपर्टाइज |
| यौन हिंसा पर महासचिव के विशेष प्रतिनिधि का कार्यालय | ग्लोबल फोरम ऑन माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट |
| पीस बिल्डिंग फंड | इंटर-अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल चेंज रिसर्च |
| पीस बिल्डिंग कमीशन | इंटरगवर्नमेंटल फोरम ऑन माइनिंग, मिनरल्स, मेटल्स, एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट |
| परमानेंट फोरम ऑन पीपल ऑफ अफ्रीका | इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज |
| UN अलायंस ऑफ सिविलाइजेशन | इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडाइवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज |
| वनों की कटाई रोकने पर सहयोग (UN-REDD) | इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ द प्रिजर्वेशन एंड रेस्टोरेशन ऑफ कल्चरल प्रॉपर्टी |
| UN कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट | इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमिटी |
| UN डेमोक्रेसी फंड | इंटरनेशनल डेवलपमेंट लॉ ऑर्गनाइजेशन |
| UN एनर्जी | इंटरनेशनल एनर्जी फोरम |
| लिंग समानता और महिलाओं का सशक्तिकरण (UN विमेन) | इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ आर्ट्स काउंसिल्स एंड कल्चर एजेंसीज |
| मानव बस्तियां कार्यक्रम (UN हैबिटेट) | इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस |
| प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (यूनिटार) | इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर जस्टिस एंड द रूल ऑफ लॉ |
| UN ओशियन | इंटरनेशनल लेड एंड जिंक स्टडी ग्रुप |
| UN जनसंख्या कोष (UNFPA) | इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी |
| UN पारंपरिक हथियार रजिस्टर | इंटरनेशनल सोलर अलायंस |
| UN सिस्टम चीफ एग्जीक्यूटिव बोर्ड फॉर कोर्डिनेशन | इंटरनेशनल ट्रॉपिकल टिंबर ऑर्गनाइजेशन |
| UN सिस्टम स्टाफ कॉलेज | पैन अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ ज्योग्राफी एंड हिस्ट्री |
| UN वाटर | पार्टनरशिप फॉर अटलांटिक कोऑपरेशन |
| UN यूनिवर्सिटी | रीजनल कोऑपरेशन एग्रीमेंट ऑन कॉम्बेटिंग पायरेसी |
| डिपार्टमेंट ऑफ सोशल एंड इकोनॉमिक अफेयर | रीजनल कोऑपरेशन काउंसिल |
| बच्चों के खिलाफ हिंसा रोकथाम | रिन्यूएबल एनर्जी पॉलिसी नेटवर्क फॉर द 21st सेंचुरी |
| साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर इन यूक्रेन | |
| सेक्रेटरिएट ऑफ द पैसिफिक रीजनल एनवायरनमेंट प्रोग्राम | |
| वेनिस कमीशन ऑफ द काउंसिल ऑफ यूरोप | |
| इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) |
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