सरकार बोली-सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत:जस्टिस नागरत्ना बोलीं- महिला को महीने के 3 दिन ‘अछूत’ मानें, चौथे दिन नहीं, ऐसा क्यों

0 108

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच ने मंगलवार को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं इस पर पहले दिन 5 घंटे सुनवाई की। केंद्र ने शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक का समर्थन किया। सरकार ने कहा-

QuoteImage

2018 में सभी वर्ग की महिलाओं को एंट्री देने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत था। यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अपने अधिकार से जुड़ा है। अदालतें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामले में दखल नहीं दे सकतीं। अगर कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका हल संसद या विधानसभा के पास है, न कि अदालत के पास।

QuoteImage

इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा- इस मामले में अनुच्छेद 17 यानी छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील किस तरह पेश की जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने 3 दिन तक तो महिला को अछूत माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई अछूतपन न रह जाए।

कोर्ट की यह टिप्पणी तब आई, जब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 2018 के सबरीमाला फैसले में कहा गया था कि 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अछूत प्रथा के बराबर है।

केंद्र ने कहा- हर धार्मिक प्रथा का सम्मान करना चाहिए, 5 पॉइंट्स

  1. सरकार ने कहा, ‘हर धार्मिक समूह की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए और हर चीज को गरिमा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना जरूरी है, तो इसे अधिकारों का हनन नहीं कहा जा सकता।
  2. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दे दिया गया हो तो अदालत उनके बीच फर्क कर सकती है कि वह एक सामाजिक बुराई है या कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। इस पर केंद्र ने कहा कि संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान अनुच्छेद 25(2)(b) में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।
  3. केंद्र ने कहा कि अगर कोई प्रथा सीधे तौर पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ है (जैसे मानव बलि), तो अदालत उसे तुरंत खारिज कर सकती है।
  4. केंद्र का तर्क था कि अदालत को यह तय करने से बचना चाहिए कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत, आधुनिक या वैज्ञानिक है या नहीं, क्योंकि इससे न्यायपालिका अपने विचार धर्म पर थोपने लगेगी।
  5. केंद्र ने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता इसलिए देता है क्योंकि धर्म में कई ऐसी मान्यताएं और प्रथाएं होती हैं जो सामान्य तर्क या बहुमत की सोच से मेल नहीं खातीं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वाली पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वाली पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े ये सवाल पिछले 26 साल से देश की अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट में आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।

दरअसल, सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला के अलावा मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला का खतना और दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने का अधिकार मिले या नहीं, कोर्ट इस पर भी फैसला करेगा।

9 जजों की बेंच के सामने सुनवाई के 5 मुद्दे

  1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं। इस फैसले के खिलाफ मंदिर के पुजारी और कुछ संस्थाओं ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं।
  2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना के मुद्दे पर 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?
  3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है?
  4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है, जो तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।
  5. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?

जस्टिस नागरत्ना देवरू मंदिर मामले जिक्र किया। कहा कि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पर विचार करेगा, जो धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक समूहों के अधिकारों से जुड़े हैं।

1. आर्टिकल 25(2)(b): समाज सुधार के लिए:

ये आर्टिकल सरकार को शक्ति देता है कि वह हिंदुओं के धार्मिक संस्थानों ‘समाज के सभी वर्गों’ के लिए खोलने का कानून बना सके।

उदाहरण: अगर कोई मंदिर कहता है कि यहां अमुक जाति के लोग नहीं आएंगे, तो सरकार इस आर्टिकल का इस्तेमाल करके उन्हें अंदर जाने का हक दिला सकती है। इसे समाज सुधार माना जाता है।

2. आर्टिकल 26(b): धार्मिक आजादी का अधिकार

यह आर्टिकल किसी भी धार्मिक संप्रदाय को यह हक देता है कि वह अपने धार्मिक मामलों में फैसले खुद ले सकते हैं।

उदाहरण: कोई मंदिर अपनी पूजा की पद्धति क्या रखेगा, कौन से मंत्र पढ़ेगा या कौन सी विशेष परंपरा निभाएगा, इसमें सरकार दखल नहीं देगी।

क्या है देवरू मामला: देवरू मामला 1958 में सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला है। कर्नाटक के देवरू में श्री वेंकटरमण मंदिर है। इसे ‘गौड़ा सारस्वत ब्राह्मण’ समुदाय चलाता था। सरकार ने एक कानून बनाया कि सभी हिंदू मंदिर दलितों के लिए खोले जाएंगे।

इसपर मंदिर ने कहा कि ये हमारा निजी मंदिर है। हमें आर्टिकल 26(b) के तहत अपने धार्मिक मामलों को खुद मैनेज करने का हक है, इसलिए हम तय करेंगे कि कौन अंदर आएगा और कौन नहीं।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर सबके लिए खोलना जरूरी है पर कुछ विशेष अवसरों पर मंदिर का समुदाय बाहरी लोगों अंदर आने से को रोक सकता है।

SG मेहता बोले- दरगाह कमेटी के मामले में अलग नजरिया अपनाया गया

SG मेहता: अब मैं ‘दरगाह कमेटी’ मामले पर आता हूं, इस मामले में पहले के फैसलों से हटकर नया नजरिया अपनाया है, जिसमें यह कहा गया है कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ ही किसी मामले को परखने का सही मापदंड है। मेरा निवेदन है कि न्यायिक व्याख्या के आधार पर दिया गया यह कथन गलत है, क्योंकि यह निष्कर्ष न तो आर्टिकल 25 और आर्टिकल 26 से निकलता है और न ही ‘शिरूर मठ’ मामले में दिए गए फैसले से।

जस्टिस नागरत्ना: देवरू मामले में, आर्टिकल 25(2)(b) के बजाय आर्टिकल 26(b) लागू होने की संभावना हो सकती है।

SG मेहता: जी हां, बिल्कुल।

जस्टिस नागरत्ना: लेकिन आपने यह बात नहीं कही।

केंद्र की ओर से पेश SG मेहता ने कहा- इस बारे में हम कुछ अमेरिकन और ऑस्ट्रेलियन केस का जिक्र कर सकते हैं, जो सभी ‘जेहोवाज विटनेसेज’ नाम के धार्मिक संगठन से जुड़े लोगों की एक्टिविटीज से पैदा हुए थे। ऑस्ट्रेलिया, यूएसए और दूसरे देशों में ढीले-ढाले तरीके से ऑर्गनाइज किए गए लोगों का यह संगठन बाइबल की सीधी-सादी व्याख्या को सही धार्मिक विश्वासों के लिए जरूरी मानता है। बाइबल की सबसे बड़ी अथॉरिटी में यह विश्वास उनके कई पॉलिटिकल विचारों को प्रभावित करता है।

वे राजा या किसी दूसरी बनी हुई इंसानी अथॉरिटी के लिए वफादारी की शपथ लेने से मना कर देते हैं और यहां तक कि नेशनल फ्लैग का भी सम्मान नहीं करते, और वे देशों के बीच सभी लड़ाइयों और सभी तरह के लड़ाई-झगड़ों की बुराई करते हैं।

1941 में ऑस्ट्रेलिया में बनी ‘जेहोवाज विटनेसेज’ की एक कंपनी ने उन मामलों की घोषणा और शिक्षा देना शुरू किया जो वॉर एक्टिविटीज और कॉमनवेल्थ की रक्षा के लिए नुकसानदायक थे और उनके खिलाफ स्टेट के नेशनल सिक्योरिटी रेगुलेशन के तहत कदम उठाए गए।

यह बात महत्वपूर्ण है कि अमेरिकी और ऑस्ट्रेलिया के संविधान में, धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार को बिना किसी रोक-टोक या सीमा के, पूरी तरह से असीमित शब्दों में घोषित किया गया है। इसलिए इन देशों की अदालतों ने नैतिकता, व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के आधार पर इस अधिकार के लिए कुछ सीमाएं लागू की हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि किसी धार्मिक संप्रदाय को खुद यह तय करने का अधिकार हो, जैसा कि ‘शिरूर मठ’ मामले में माना गया था, लेकिन ‘दरगाह कमेटी’ मामले में इस सिद्धांत से हटकर फैसला दिया गया।

‘रतिलाल पानचंद गांधी’ मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहते हैं कि इस मामले में भी बेंच की संरचना लगभग वैसी ही है। मेरी राय में, यह फैसला भी वही दृष्टिकोण अपनाता है, क्योंकि दोनों ही मामलों में फैसला लिखने वाले जज एक ही थे।

वेंकटरमण देवरू केस संभवत: पहला और एकमात्र ऐसा फैसला है जिसमें संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 को एक साथ पढ़ा गया है। इस मामले में मुख्य चुनौती यह थी कि क्या अनुच्छेद 26(b) के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय को दी गई गारंटीकृत स्वतंत्रता के अधिकार को, अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत कंट्रोल किया जा सकता है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.