पाकिस्तान गाजा में 20 हजार सैनिक तैनात करेगा:दावा- ये हमास से हथियार सरेंडर कराएंगे, पाकिस्तान-इजराइल में सीक्रेट समझौता
इस्लामिक दुनिया के साथ PAK का विश्वासघात! जिस इजरायल को बताया दुश्मन, उसी के लिए मुनीर गाजा में करेगा काम
पाकिस्तान गाजा में 20 हजार सैनिक तैनात करेगा। इन सैनिकों का काम हमास से हथियार सरेंडर करवाना और इलाके में शांति बनाए रखना होगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने इसे लेकर इजराइल के साथ सीक्रेट समझौता किया है। ये सैनिक इंटरनेशनल स्टैबिलाइजेशन फोर्स (ISF) का हिस्सा होंगे, जो गाजा में शांति समझौता लागू करेंगे।
इसे लेकर मिस्र की राजधानी काहिरा में एक सीक्रेट बैठक हुई थी। इसमें इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के बड़े अधिकारी के साथ पाकिस्तान और अमेरिकी खुफिया एजेंसी के अधिकारी शामिल थे।
दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गाजा जंग को रोकने के लिए 29 सितंबर को 20 सूत्री शांति योजना पेश की थी। इस योजना में हमास का हथियार डालना सबसे अहम शर्त है।

पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती नहीं चाहता तुर्किये
रिपोर्ट्स के मुताबिक तुर्किये, अजरबैजान और कतर इस फैसले से नाराज हैं। ये देश नहीं चाहते हैं कि पाकिस्तानी सैनिकों की गाजा में तैनाती हो। पाकिस्तान की तुर्किये से गहरी दोस्ती है, लेकिन वह ट्रम्प को भी नाराज नहीं करना चाहता।
पाकिस्तानी सैनिक गाजा में इंडोनेशिया और अजरबैजान के सैनिकों के साथ मिलकर काम करेंगे। वे गाजा में सिक्योरिटी मैनेजमेंट देखेंगे, इमारतें बनवाएंगे और हमास को पूरी तरह कंट्रोल करेंगे।
ट्रम्प ने मिस्र में सीजफायर समझौते पर साइन किए थे
ट्रम्प ने 13 अक्टूबर को मिस्र के शहर शर्म अल शेख में गाजा शांति समझौते पर साइन किए थे। इस दौरान 20 से ज्यादा देशों के नेता वहां मौजूद थे, लेकिन इजराइल और हमास को नहीं बुलाया गया था।
शांति प्रस्ताव पर साइन करने के बाद ट्रम्प ने समझौते का आखिरी पेज प्रेस को दिखाया था। इसपर लिखा था कि हर व्यक्ति को सम्मान, शांति और बराबर मौके मिलने चाहिए। हम चाहते हैं कि यह क्षेत्र ऐसा हो जहां हर कोई शांति और सुरक्षा में अपने सपने पूरे कर सके चाहे वह किसी भी धर्म या नस्ल का हो।

पाकिस्तान ने इजराइल को देश की मान्यता नहीं दी
पाकिस्तान ने भले ही इजराइल के साथ सीक्रेट समझौता किया है, लेकिन उसने आज तक इजराइल को देश की मान्यता नहीं दी है। उसके नेता कई बार सभी मुस्लिमों देशों से इजराइल के खिलाफ के साथ आने की अपील कर चुके हैं।
पाकिस्तानी रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने 10 अक्टूबर को कहा था कि इजराइल का मकसद मुस्लिम दुनिया की ताकत खत्म करना है। इजराइल के साथ नरमी बरतना गलत है। मुस्लिम देशों को इजराइल के खिलाफ साथ आना होगा।

ट्रम्प के सीजफायर प्लान के 20 पॉइंट
ट्रम्प के प्लान में गाजा में युद्ध रोकना, सभी बंधकों को छोड़ना और गाजा में प्रशासन चलाने के लिए एक अस्थायी बोर्ड बनाने का प्रस्ताव है।
ट्रम्प इस बोर्ड की अध्यक्षता करेंगे और इसमें पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर भी होंगे।
- तुरंत युद्ध रोकना- इजराइल और हमास के बीच सहमति बनी तो गाजा में युद्ध तुरंत खत्म होगा।
- इजराइल पीछे हटेगा- सहमति से इजराइल अपनी सेनाओं को धीरे-धीरे गाजा से निकाल लेगा।
- बंधकों को छोड़ना- हमास 72 घंटे में सभी इजराइली बंधकों को रिहा करेगा, जिनमें जिंदा और मृत दोनों होंगे।
- कैदियों की रिहाई- युद्ध खत्म होने पर इजराइल, गाजा के उम्रकैद की सजा काट रहे 250 लोगों और अन्य 1700 कैदियों को छोड़ देगा।
- शवों का आदान-प्रदान – हर मृत इजराइली कैदी के बदले 15 मृत फिलिस्तीनी कैदियों के शव लौटाए जाएंगे।
- गाजा को आतंक मुक्त बनाना- गाजा से हमास के सारे ठिकाने और हथियार हटाए जाएंगे।
- हमास प्रशासन में शामिल नहीं- हमास और अन्य लड़ाके गाजा की सरकार में हिस्सा नहीं लेंगे।
- अंतरिम प्रशासन समिति- गाजा के लिए एक अस्थायी तकनीकी समिति बनाई जाएगी, जिसमें योग्य लोग होंगे।
- शांति बोर्ड बनेगा- इस बोर्ड की अध्यक्षता अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प करेंगे, इसमें टोनी ब्लेयर और अन्य देशों के नेता शामिल होंगे।
- पुनर्निर्माण योजना- बोर्ड गाजा के विकास और सुधार की योजना बनाएगा और उसका खर्च उठाएगा।
- मानव सहायता- गाजा को तुरंत पर्याप्त मदद दी जाएगी।
- विशेष व्यापार क्षेत्र- गाजा में खास व्यापारिक क्षेत्र बनाए जाएंगे, जिससे रोजगार बढ़ेगा।
- लोगों की आजादी- किसी को गाजा छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा; जो चाहे जा सकता है और लौट सकता है।
- सुरक्षा के लिए फोर्सेस- एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल गाजा में सुरक्षा बनाए रखेगा।
- पुलिस की ट्रेनिंग- सुरक्षा बल गाजा पुलिस को ट्रेनिंग देंगे और मदद करेंगे।
- सीमा सुरक्षा- इजराइल और मिस्र की सीमाओं पर सुरक्षा मजबूत होगी।
- लड़ाई बंद- युद्ध खत्म होने तक हवाई हमले और गोलाबारी रोकी जाएगी।
- मानवाधिकार सुनिश्चित- अंतरराष्ट्रीय संगठन गाजा में मदद और सुरक्षा की निगरानी करेंगे।
- शांति बातचीत- इजराइल और फिलिस्तीन के बीच शांति के लिए बातचीत शुरू होगी।
- भविष्य की योजना– इस योजना का मकसद गाजा में स्थायी शांति, विकास और बेहतर जीवन लाना है।
पाकिस्तान सरकार जल्द ही गाजा पट्टी में लगभग 20 हजार सैनिकों की तैनाती करने की तैयारी कर रही है. यह कदम गाजा क्षेत्र में पश्चिमी देशों की निगरानी में शुरू होने वाले स्थिरीकरण और पुनर्वास कार्यक्रम का हिस्सा बताया जा रहा है.
हालांकि, इस फैसले ने पाकिस्तान के भीतर ही भारी विवाद खड़ा कर दिया है, क्योंकि कई पूर्व राजनयिकों, सैन्य विशेषज्ञों और पत्रकारों ने इस कदम को “राजनीतिक रूप से आत्मघाती” और “इस्लामी दुनिया के साथ विश्वासघात” बताया है.
गुप्त समझौते का खुलासा
एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह निर्णय उस समय लिया गया जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने मिस्र में इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद और अमेरिकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CIA) के वरिष्ठ अधिकारियों से कई गुप्त मुलाकातें कीं. बताया जा रहा है कि इन बैठकों में गाजा में पाकिस्तानी सैनिकों की संभावित भूमिका को लेकर चर्चा हुई.
चौंकाने वाली बात यह है कि पाकिस्तान अब तक इजरायल को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं देता, फिर भी उसकी सेना के शीर्ष अधिकारी मोसाद और सीआईए के संपर्क में हैं. यह स्थिति पाकिस्तान की विदेश नीति और उसके “मुस्लिम राष्ट्रवाद” के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
पाकिस्तान के अंदर बढ़ा विरोध
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार मोइद पीरजादा ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाते हुए लिखा, “तो क्या इसका मतलब है कि पाकिस्तानी सेना की ‘मुस्लिम पहचान’ और ‘राष्ट्रवाद’ केवल दिखावा था? असल में यह एक औपनिवेशिक ढांचे में बनी सेना है, जिसका मकसद बाहरी शक्तियों के हित साधना है.”
इसी तरह जानी-मानी विश्लेषक आएशा सिद्धीकी ने भी सेना पर तीखा हमला किया. उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान ने अतीत में भी फिलिस्तीनियों के खिलाफ कार्रवाई की थी और हजारों लोगों की जान ली थी. उनके अनुसार, सेना का यह इतिहास “फिलिस्तीन के समर्थन” के सभी दावों को झूठा साबित करता है.
पुनर्वास के नाम पर सैन्य कार्रवाई का आरोप
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तानी सैनिकों को औपचारिक रूप से “पुनर्वास और राहत कार्य” के नाम पर गाजा भेजा जाएगा, लेकिन उनकी असली जिम्मेदारी हमास के बचे हुए लड़ाकों को खत्म करना होगी. कहा जा रहा है कि पाकिस्तान को यह काम अमेरिका और पश्चिमी देशों की योजना के तहत दिया गया है, ताकि गाजा क्षेत्र को उनकी रणनीति के अनुसार स्थिर किया जा सके.
इस योजना में इंडोनेशिया और अज़रबैजान की सीमित भूमिका भी बताई जा रही है. माना जा रहा है कि ये देश गाजा के अस्थायी प्रशासनिक ढांचे में शामिल होकर “शांति स्थापना बल” के रूप में काम करेंगे.
असीम मुनीर की मध्य-पूर्वी कूटनीति
इस बीच, जनरल असीम मुनीर ने जॉर्डन के शाह किंग अब्दुल्ला और जॉर्डन के सैन्य प्रमुख मेजर जनरल यूसुफ हुनेती के साथ अम्मान में अहम बैठक की. जॉर्डन, गाजा पट्टी के बेहद करीब है और पाकिस्तानी सेना की किसी भी तैनाती के लिए उसका सहयोग आवश्यक माना जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह पूरी कूटनीति अमेरिकी प्रभाव में हो रही है. यही कारण है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मौजूदा प्रशासन दोनों ने असीम मुनीर की “सुरक्षा नीति” की खुलकर तारीफ की थी.
इजरायल को लेकर नरम पड़ता पाकिस्तान?
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान अपने पासपोर्ट से “इजरायल के लिए मान्य नहीं” वाली लाइन हटाने की तैयारी कर रहा है. यदि ऐसा होता है, तो यह पाकिस्तान की विदेश नीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा.
इजरायली मीडिया ने इस संभावित कदम को “संवेदनशील लेकिन रणनीतिक रूप से फायदेमंद” बताया है. हालांकि, इस बदलाव ने ईरान, तुर्की और कतर जैसे देशों में नाराजगी पैदा कर दी है, जो हमास के खुले समर्थक हैं.
अरब देशों का विरोध
ईरान, तुर्की और कतर ने संकेत दिए हैं कि वे गाजा में पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती का कड़ा विरोध करेंगे. उनका कहना है कि यह कदम इजरायल और अमेरिका के हितों को साधने के लिए उठाया जा रहा है, न कि मानवीय सहायता के लिए.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से पाकिस्तान के अरब जगत के साथ रिश्ते और भी खराब हो सकते हैं, खासकर ऐसे समय में जब उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही खस्ताहाल है.
इतिहास दोहराने की आशंका: ‘ब्लैक सितंबर’ की याद
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान फिलिस्तीनी क्षेत्र से जुड़ी किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल हो रहा है. वर्ष 1970 में जॉर्डन के किंग हुसैन के शासन के दौरान, पाकिस्तान ने अपने सैन्य अधिकारी जिया-उल-हक़ के नेतृत्व में फिलिस्तीनी लड़ाकों के खिलाफ कार्रवाई की थी.
उस समय पाकिस्तान की सेना ने जॉर्डन के साथ मिलकर केवल 11 दिनों में 20 से 25 हजार फिलिस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया था. इस घटना को इतिहास में “ब्लैक सितंबर” के नाम से जाना जाता है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने जॉर्डन में पैदल सेना और एंटी-एयरक्राफ्ट यूनिट भेजी थी, जिसने अमान की सड़कों पर फिलिस्तीनी शरणार्थियों पर भीषण हमला किया था.
‘फिलिस्तीनियों का कातिल’ कहा गया पाकिस्तान को
पूर्व इजरायली मंत्री मोशे दयान ने एक बार कहा था कि “पाकिस्तान ने 11 दिनों में जितने फिलिस्तीनियों को मारा, उतने इजरायल ने 20 वर्षों में भी नहीं मारे.” पाकिस्तानी पत्रकार शेख अजीज ने लिखा कि जिया-उल-हक को अपने देश में “फिलिस्तीनियों का कातिल” कहा जाने लगा था.
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान की सेना अक्सर विदेशी पैसों और राजनीतिक गठबंधनों के लिए काम करती है, चाहे वह अपने ही धार्मिक या क्षेत्रीय साझेदारों के खिलाफ क्यों न हो.
देश के अंदर से उठती आवाजें
पाकिस्तान के सीनेटर अल्लामा राजा नासिर ने सेना के इस नए फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि यह कदम “इजरायल की मदद के लिए उठाया गया है.” उन्होंने कहा कि वही सेना जिसने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में लाखों लोगों की हत्या की और हजारों महिलाओं के साथ अत्याचार किए, उससे मानवता की उम्मीद करना बेकार है.
विश्लेषकों का कहना है कि यदि पाकिस्तान वाकई गाजा में सैनिक भेजता है, तो यह न केवल उसकी “इस्लामी एकजुटता” की छवि को खत्म करेगा बल्कि उसे पश्चिमी शक्तियों के कठपुतली राष्ट्र के रूप में भी दिखाएगा.