Bathinda-निगम चुनावों में अकाली दल के 12 नेता कांग्रेस में पहुंचकर दे रहे फायदे पर अकाली दल को हुआ नुकसान

-कांग्रेस के पास नेताओं की भरमार, टिकट नहीं मिलने पर बगावती तेवर अपना सकते हैं कई नेता -अकाली दल अब भाजपा और आप के नेताओं पर रख रहा नजर, अकाली दल में शामिल करने की मुहिम, शहर में पानी, सीवरेज व सड़कों की स्थिति सुधरी लेकिन लावारिस जानवरों का मुद्दा अभी भी बरकरार।

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बठिंडा. नगर निगम में अपना वर्चस्व बनाने को जुटी कांग्रेस पार्टी अब तक एक दर्जन से अधिक पार्षदों को अपने खेमे में शामिल कर चुकी है। इसमें वार्ड नंबर 23 की आजाद पार्षद कमलेश मेहरा व उसका पति राज मेहरा ने कांग्रेस में शामिल होने का ऐलान किया। वही वार्ज नंबर 40 की अकाली पार्षद छिंदर कौर सिद्धू व उनके पति वार्ड 40 के पूर्व पार्षद बंत सिंह सिद्धू कांग्रेस में शामिल हुए। जबकि इससे पहले शिअद के राजिदर सिद्धू, बलजीत सिंह राजू, मा. हरमंदर सिंह, शाम लाल जैन, संतोश महंत, भाजपा से प्रियंका गोयल व अशेषर पासवान के अलावा जबकि आजाद पार्षद दर्शना रानी, जसवीर जस्सा, दर्शन बिल्लू व प्रदीप गोयल भी कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं।

जहां अकाली कमजोर वहां कांग्रेस की स्थिति मजबूत

इस स्थिति में अकाली दल जहां कमजोर हुई है वही कांग्रेस की स्थिति मजबूत हुई है। अब कांग्रेस के लिए दूसरी बड़ी चुनौती यह होगी कि वह टिकट आबंटन कैसे करती है। कांग्रेस ने जिन 12 से अधिक पार्षदों को अकाली दल से कांग्रेस में जोड़ा है वह सभी चुनावों में टिकट के दावेदार है। अब जिव वार्डों में उक्त लोग दावेदारी कर रहे हैं उनमें पहले से ही कांग्रेस के पुराने नेता ताल ठोक रहे हैं।

इस स्थिति में अकाली दल छोड़कर कांग्रेस में आए लोगों को टिकट नहीं मिलती तो वह घर वापसी कर सकते हैं या फिर टक्साली कांग्रेसी अपनी पार्टी के खिलाफ बगावती तेवर दिखा सकते हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए कांग्रेस ने बी प्लान बनाया है। इसमें विभिन्न कमेटियों में उन्हें प्रतिनिधित्व देने या फिर जिला कांग्रेस कमेटी जो अभी भंग है में प्रतिनिधित्व देने का आश्वासन दे सकते हैं। इसके चलते कांग्रेस के अंदर बगावती स्वर कम होने का रास्ता तैयार कर लिया है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयजीत सिंह जौहल का कहना है कि अकाली दल, भाजपा व आप के मुकाबले कांग्रेस काफी मजूबत है वही कांग्रेस जीतने वाले लोगों को अपना उम्मीदवार बनाएंगी। हमारे पास विकास कार्यों का लंबा खाका है जो हमने शहरवासियों के लिए किए है। जिन कार्यों को अकाली अपने दस साल के कार्यकाल में नहीं करवा सके उन्होंने पिछले चार साल में पूरा करवाया है। कई प्रोजेक्टों पर काम तेजी से चल रहा है। यही कारण है कि दूसरे दलों के नेता कांग्रेस में आ रहे हैं।

अकाली दल ने भी नेताओंं की घर वापसी के लिए लगाया जोर

वही अकाली दल ने अब पुराने ऐसे पार्षदों को संपर्क साधना शुरू कर दिए है जो कांग्रेस या फिर भाजपा में है। पिछले दिनों भारतीयजनता पार्टी की दिग्गज नेत्री व महिला पाषर्द अंजना रानी ने अकाली दल का दामन थामकर सभी को हैरान कर दिया था। वही अकाली दल अब कांग्रेस में सेधमारी नहीं होने पर भाजपा व आप के किले में सेध लगा रहा है।

अकाली दल के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक सरुपचंद सिंगला का कहना है कि अकाली दल में कांग्रेस के साथ दूसरे दलों के नेता आने के लिए उनके संपर्क में है व जल्द ही उन्हें अकाली दल में शामिल किया जाएगा। अकाली दल पहले से मजबूत हुआ है व निगम चुनावों के परिणाम इसे साबित करेंगे। हमारा तीसरी बार नगर निगम में मेयर होगा। लोग कांग्रेस की नीतियों से तंग आ चुके हैं व चुनावों में किए वायदों को पूरा नहीं करने से उनमें नाराजदी है। इस स्थिति में वह निगम की सत्ता में अकाली दल को देखना चाहते हैं।

कुछ मुद्दे हुए निरस्त तो लावारिस जानवरों की समस्या अबी बरकरार

दूसरी तरफ वर्तमान में किसान बिलों का मुद्दा राज्य में सबसे ज्यादा हावी है लेकिन नगर निगम चुनावों में जहां अधिकतर वोटर अग्रवाल समाज से जुड़ा है उन पर इस आंदोल का ज्यादा असर होता नही दिखाई दे रहा है। अकाली दल के पास किसानों के मुद्दे पर राजनीति करना का बेहतर अवसर है जबकि कांग्रेस भी इस मुद्दे को भुना रही है लेकिन शहर में प्रमुख मुद्दा विकास और प्रोजेक्ट है जिसके आधार पर ही लोग अपना जनप्रतिनिधि चुनेंगे। शहर में सड़कों की हालत मुद्दा नहीं रहा क्योंकि हर गली मुहल्लों में कांग्रेस ने सड़कों को रिपेयर करने से लेकर उन्हें फिर से बनाने का काम पूरा कर लिया है। सीवरेज समस्या भी लगभग हल होती दिख रही है हालांकि सिरकी बाजार में बरसातों के दिनों में पानी भरने की समस्या पहले की तरह बरकरार है लेकिन इसमें भी कांग्रेस ने कुछ सुधार किया जिससे पानी काफी दिनों तक नहीं ठहरता है। वही पानी की सप्लाई सुचारु होने से मुद्दा नहीं टिकता है। अब आखिरी मुद्दा जनप्रतिनिधियों का लोगों के बीच रहने का बचा है। लोगों को शिकायत रहती है कि पार्षद चुने जाने के बाद उनकी समस्या सुनने के लिए प्रतिनिधि उनके बीच नहीं आता है वही पांच साल तक जो समस्या उन्हें आती है उसे नजरअंदाज रखा जाता है। शहर में लावारिस जानवरों की समस्या अभी भी बरकरार है जिसके चलते सड़कों में हादसे हो रहे हैं व ट्रैफिक जाम हो रहे हैं। फिलहाल इन तमाम मुद्दों पर राजनीतिक दल एक दूसरे पर आरोप प्रतिरोप लगा रहे हैं जो आने वाले समय में बड़ा मुद्दा बनकर सामने आएगा।

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